Dil Madari -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
· Pustak Samiksha: Atulya Khare
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समीक्षित पुस्तक
: दिल मदारी
- · द्वारा : पूनम अहमद
- · साहित्य विमर्श द्वारा प्रकाशित
- · प्रथम संस्करण : 2026
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मूल्य- 199/-
- · समीक्षा क्रमांक : 241

"मून गेट", "अपने अपने मेघदूत", "कोयले की लकीर", और "कुछ इस तरह" जैसे लोकप्रिय कहानी संग्रहों के बाद अब पूनम जी की यह नवीनतम रचना एवं प्रथम उपन्यास “दिल मदारी” जिसका इंतजार लंबे समय से उनके पाठकों को था, जिसके आने में पिछली कृति के पश्चात कुछ विलंब तो अवश्य हुआ है किन्तु उपन्यास पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया यही रही कि “देर आयद दुरुस्त आयद”।
सर्वप्रथम बात करें शीर्षक की, तो शीर्षक है ही इतना अलग सा और दिलचस्प कि बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। उपन्यास में ऊर्जा से भरे हुए युवा हैं जो आधुनिक होते हुए भी अपनी जड़ों और संस्कारों से जुड़े हुए हैं, काम के प्रति निष्ठावान हैं, परिवार के प्रति समर्पित और दोस्ती के अटूट बन्धन में बंधे हुए हैं। मुंबई की व्यस्त ज़िंदगी के परिवेश में इंसानी रिश्तों की ऊष्मा को भी पूनम जी ने प्रेम से सँजोया एवं प्रस्तुत किया है।
कहानी जहां एक ओर एक कोमल, भावनात्मक प्रेम कहानी का खाका खींचती है वहीं दूसरी ओर
नारी मन के उन कोनों को छूती है, जहाँ अक्सर सामाजिक और पारिवारिक वर्जनाओं का डर पैर
पसेरे रहता है। विजातीय प्रेम के प्रति परिवार की नकारात्मकता और नायिका की
प्रतिबद्धता तथा अपने इस लक्ष्य को पाने हेतु उसके द्वारा लिए गए साहसिक निर्णयों
को विस्तार एवं रोचकता संग रचा है। प्रेम कहानी से ऊपर उठते हुए सामाजिक बंधनों
एवं नारी संकल्प एवं संघर्ष को सँजोये प्रस्तुतीकरण अद्भुत है।
"इसी पुस्तक से"
कहानी का पूर्वार्ध मूलतः समय की कमी और भावनाओं का सैलाब या प्रचुरता के बीच का द्वंद्व है। यहाँ कहने को बहुत कुछ है पर समय
नहीं है, कह सकते हैं कि यह केवल एक प्रेम कहानी नहीं,
बल्कि एक माह के कुल अरसे में से कुछ चुराए हुए पलों का लिखित
दस्तावेज़ है। समय और दूरी जैसी मुश्किलात से जूझते हर प्रेमी युगल को कहानी बेहद
अपनी सी लगेगी।
प्रेम में सदा से ही एक खूबसूरत विरोधाभास भी inbuilt है। प्रेम में एक प्रवृत्ति होती है दुनिया से अपने रिश्ते को छिपाकर रखने
की, लेकिन दिल चाहता है कि सारी दुनिया के सामने अपने प्यार का इजहार जोर शोर से
करें, और इस अनकहे रिश्ते को सामाजिक स्वीकृति का मिल जाना भी प्रेम की एक अहम
कड़ी है।
दोनों के बीच बिना एक-दूसरे के कहे ही, मन की बात पढ़ लेने की प्रक्रिया का शुरु होना उनके
बीच का रूहानी जुड़ाव दर्शाता है । कहानी के पूर्वार्ध की बहुत सी छोटी छोटी बातों
में यथा हाथ थामने जैसे पहले स्पर्श के एहसास में, पहली बार नजरें उठा कर देख लेने
में, भीड़ में एक-दूसरे को तलाशती नजरें, और बिना बोले विदाई की आहट अनुभव कर लेना और भी ऐसे ही
बहुत से छोटे किन्तु असाधारण किस्सों में कहानी की जान बसी है।
कथानक में जहां एक तरफ छुट्टियां खत्म होने और विदेश वापस लौटने का डर बखूबी चित्रित किया गया है वहीं कथानक में जैकब के वापसी के पलों को शब्दों में उकेरने में पूनम जी ने कमाल कर दिया है। युगल के मध्य प्यार का अंकुर तो फूट पड़ा प्यार की कोपलें आ गई हैं, किंतु उसके साथ उपजीं शंकाएं, अनिश्चितताएं और बिछोह के डर के बादलों ने भी घेरा डाल रखा है।
लेखिका ने इन क्षणों को इतनी सहजता और आत्मीयता से पिरोया है कि पाठक को नायिका और लेखिका एकाकार होती प्रतीत होती हैं। दूसरी तरफ विदेशी नौकरी और घर की मिट्टी के बीच फंसी आज के युवा की जिंदगी को भी भावनात्मकता संग दर्शाया है। यह अनिश्चितता ही प्रेम में मिलन के पलों को अविस्मरणीय बनाती है क्योंकि पात्र जानते हैं कि वे जिस पल को जी रहे हैं, वह शायद दोबारा न मिले।
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धर्म
में अगर प्रेम का समावेश हो तब उसका विस्तार होता है । इसी पुस्तक से |
कथानक में आगे , डॉक्टर द्वारा अपने बेटे एवं नायिका के
प्रेमी को नायिका के संग घटित sexual abuse के विषय में बात करना और समझाइश देना इतना अधिक
व्यवस्थित है कि लेखन प्रभावित करता है साथ ही एक सुशिक्षित पिता पुत्र
के मध्य शालीन एवं मर्यादित संवाद की मिसाल भी दर्शाता है।
नायिका का अपने प्रेमी युवक से विवाह करने तथा फिलहाल माता पिता को किसी सजातीय एवं उनकी पसंद के युवक से विवाह करवाने से रोकने हेतु पढ़ाई के बहाने विदेश जाने के निर्णय से लेकर अंतिम समाधान तक का सफर पूरी तरह से व्यवस्थित है। नायिका द्वारा सामाजिक एवं पारिवारिक मूल्यों का सम्मान करते हुए तथा माता-पिता की भावनाओं को चोट पहुचाए बगैर उन्हें जैकब के साथ अपने रिश्ते के लिए तैयार करना उसके लालनपालन एवं संस्कारों की जीवंत व्याख्या है।
नायिका द्वारा अपने अभिभावकों के संग सम्मानजनक व्यवहार
तथा समग्रता में उसका संस्कारित आचरण आधुनिक पीढ़ी हेतु मिसाल प्रस्तुत करता है। नायिका
की आंतरिक भावनाओं का सूक्ष्म अवलोकन और विदेश के परिवेश का जीवंत वर्णन पुस्तक को
रोचक बनाए रखता है।
कथानक में मात्र विवाह अथवा नारी शिक्षा की बात नहीं है,
बल्कि यह स्त्री के अपने जीवन से संबंधित निर्णय लेने की
एक कठिन किन्तु साहसिक यात्रा का दस्तावेज़ है।
भावनाओं की गहराई और द्वंद्व को बहुत ही मार्मिक तरीके से व्यक्त किया है। लेखिका द्वारा
जिस प्रकार विदेशी शहरों
का जीवंत चित्रण एवं नायक की गर्म जोशी तथा भद्र सौम्य व्यवहार दर्शाया गया है वह प्रभावित
करता है साथ ही कैसे नायिका के दिल से पुरुष स्पर्श के संबंधित
वह बचपन का डर निकलता है यह प्रस्तुति भी मर्यादित भाषा
के संग शालीन एवं सहज है।
लेखिका अपने कथ्य की
सार्थकता सिद्ध करने में शत-प्रतिशत सफल रही हैं। लेखिका द्वारा वरधा के अंतर्मन
का चित्रण अत्यंत जीवंत और सहज है इस बिन्दु पर लेखिका की परिपक्वता एवं भावुक
क्षणों को हू-बहू शाब्दिक अभिव्यक्ति देने की कला इस कृति को पूर्णतः सफल बनाती
है। वहीं विजातीय विवाह
एवं स्त्री शिक्षा पर भी गहन विश्लेषण के संग प्रस्तुति है। चित्रण न केवल सहज है, बल्कि अत्यंत संवेदनशील भी है। लेखिका ने पात्रों के इस
रूख के द्वारा एक बड़े पाठक वर्ग को आत्मचिंतन हेतु विवश किया है।
कथानक तो स्वयं ही अत्यंत रोचक है वहीं
लेखिका की शैली के कारण पुस्तक और भी विशेष आकर्षक बन
पड़ी है । लेखिका ने जिस संयमित और प्रभावी शैली का प्रयोग किया है,
वह कथानक की रोचकता को दोगुना कर देता है। एक अत्यंत
प्रभावशाली और पठनीय रचना।
अतुल्य खरे
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